इतिहास में गुम नायकों की गाथा

इतिहास जब केवल विजेताओं द्वारा लिखा जाता है, तब वह स्मृति नहीं बल्कि राजनीति बन जाता है। भारत जैसे देश में जहां साधु-संतों, लोकनायकों, समाज सुधारकों और आम लोगों के संघर्ष ने राष्ट्र की आत्मा को आकार दिया, वहां इन गुमनाम नायकों को इतिहास में वह स्थान नहीं मिल सका, जिसके वे हकदार थे। इसी ऐतिहासिक अन्याय को उजागर करती है डॉ. यशपाल सिंह की पुस्तक 'गौरव गाथा: भूले हुए नायकों का भारत'।

पुस्तक में भारत के उन वीरों, संतों और समाज सुधारकों की प्रेरणादायक कथाएं प्रस्तुत की गई हैं, जिन्होंने संस्कृति और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए, लेकिन इतिहास के पन्नों में जिनका उल्लेख सीमित रह गया। राजा महेंद्र प्रताप सिंहधनसिंह कोतवाल,

सरदार उधम सिंह, स्वामी दयानंद और पंडित लेखराम जैसे नायकों की गाथाएं इस पुस्तक में जीवंत रूप में सामने आती हैं।

लेखक का मानना है कि इतिहास लेखन में निष्पक्षता और व्यापक दृष्टिकोण का अभाव रहा है। जहां एक ओर मुगल शासकों की प्रशासनिक उपलब्धियों को प्रमुखता से स्थान मिला, वहीं महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी और पृथ्वीराज चौहान जैसे आत्मगौरव के प्रतीकों को सीमित संदर्भों में प्रस्तुत किया गया। यह असंतुलन केवल बौद्धिक अन्याय नहीं, बल्कि सांस्कृक्तिक विस्मृति का कारण भी बना। पुस्तक का प्रकाशन प्रवासी प्रेम पब्लिशिंग द्वारा किया गया है और इसका मूल्य 500 रुपये रखा गया है।

यह पुस्तक न केवल ऐतिहासिक तथ्यों को सामने लाती है, बल्कि वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों को अपने गौरवशाली अतीत से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य भी करती है। इतिहास लेखन की चुनौतियों और निष्पक्ष दृष्टिकोण की आवश्यकता पर गंभीर विमर्श के साथ यह पुस्तक पाठकों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि राष्ट्र की असली ताकत केवल राजाओं में नहीं, बल्कि उन अनगिनत नायकों में भी है, जिन्होंने चुपचाप इतिहास की दिशा बदल दी 

गौरव गाथा

(भूले हुए नायकों का भारत)

लेखक : डॉ. यशपाल सिंह

प्रकाशक : प्रवासी प्रेम पब्लिशिंग, इंडिया गाजियाबाद

मूल्यः 500/- रुपए